सो०-जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन ।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन ।।1।।
मूक होइ बाचाल पंगु चढइ गिरिबर गहन । जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन ।।2।।
नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन। करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन ।।3।।
कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन । जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन ।।4।।
बंदउ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर ।।5।।
बंदउ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू ।। सुकृति संभु तन बिमल बिभूती। मंजुल मंगल मोद प्रसूती ।। जन मन मंजु मुकुर मल हरनी। किएँ तिलक गुन गन बस करनी ।।
श्रीगुर पद नख मनि गन जोती। सुमिरत दिब्य दृष्टि हियँ होती ।। दलन मोह तम सो सप्रकासू। बड़े भाग उर आवइ जासू ।।
उघरहिं बिमल बिलोचन ही के। मिटहिं दोष दुख भव रजनी के ।। सूझहिं राम चरित मनि मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक ।।
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